Sunday, October 7, 2007

नादाँ दिल


नादाँ है मेरा दिल,
देख क्या चाहता है...
इश्क के जख्मों के लिए,
इश्क कि दवा चाहता है.....

जानता है के टूट जाएगा,
फिर भी एक ख्वाब चाहता है...
जफ़ा के शहर में खोज रहा है,
वफ़ा चाहता है...
नादाँ मेरा दिल देख क्या चाहता है....

क़त्ल होने कि चाह है इसको,
एक कातिल चाहता है...
अम्वास कि रात है,
चांद का दीदार चाहता है...

नादाँ है मेरा दिल देख क्या चाहता है....
इश्क के दिए जख्मो के लिए
इश्क कि दवा चाहता है...

ritu saroha

5 comments:

Sid said...

I guess you need to read more before your next composition. Its highly unpoetic and there is nothing new or innovative in words, thoughts, or expressions.

विपिन चौहान "मन" said...

जो लोग ये कहते हैं की आप को और ज्यादा पढना चाहिए
उनका कहना एक हद तक तो ठीक है
पर ग़ज़ल को हलके में लिया जाए ये तो ग़लत है
ग़ज़ल में हर पंक्ति में नयापन हो ये कोई जरूरी तो नहीं है
और नयापन शायद पाठक की सोच मॆं होता है
ग़ज़ल कभी नई या पुरानी नहीं होती है
ग़ज़ल को जो भाव शायरा ने दिए हैं वो अपने आप में बहुत गहरे हैं
अगर ग़ज़ल टूटन को दर्शाती है तो उसकी अपनी विवशता है और अपनी एक आशा भी है
ये दोनों चीज़ ग़ज़ल में एक साथ चलती हैं ये अपने आप मॆं बहुत बड़ी बात है
मैं इस ग़ज़ल को बहुत सुन्दर मानता हूँ

RATIONAL RELATIVITY said...

"अम्वास कि रात है,
चांद का दीदार चाहता है..."

दिल के तडप को खूबसूरती से बयां करती है ये पंक्तियां.और दिल की बात कहने के लिये लिखने-पढने की ज़रूरत हमारे बंधुओं को आन पडी है , तो ये उनकी समस्या है.आप तो ऐसे ही लिखते रहिए.

ख्वाब है अफसाने हक़ीक़त के said...

bahut khoobsurat abhivyakti hai..kam shabdo mein puri baat kah di. Aap badhaai ki paatr hain.

Deepak Gogia.

honey said...

ik sapna toot gia
to kia hua

ik apna chhoot gia
to kia hua

hum basera phir naia
ik basae ge

khuda ko phir
apne hum manae ge

ik pal zindagi ka
humse rooth gia to kia hua

hum us pal ko bhula ke
apni zindagi mai lot jaenge……….

keep it up girl u got fire in u dont let it die